गुरुवार व्रत क्यों रखा जाता है और गुरुवार व्रत की विधि?
गुरुवार या बृहस्पतिवार का दिन सप्ताह का सबसे महत्वपूर्ण दिनों में से एक माना जाता है। यह दिन "गुरु" यानी आध्यात्मिक और भौतिक जीवन के मार्गदर्शक, देवगुरु बृहस्पति को समर्पित है। इस दिन व्रत रखकर और विधिवत पूजा करके व्यक्ति ज्ञान, समृद्धि, संतान सुख और मान-सम्मान की प्राप्ति कर सकता है।
गुरुवार व्रत और पूजा का महत्व
गुरु का स्थान: बृहस्पति देवताओं के गुरु हैं। उनकी कृपा से ही कठिन से कठिन विद्याएं सरलता से प्राप्त हो जाती हैं।
ग्रहों के गुरु: ज्योतिष में बृहस्पति ग्रह को 'आत्माकारक' माना जाता है। यह भाग्य, धर्म और उन्नति का प्रतीक है। इसका शुभ प्रभाव जीवन में सफलता दिलाता है।
विष्णु का दिन: मान्यता है कि गुरुवार को भगवान विष्णु का दिन भी होता है। इसलिए इस दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है।
संकट निवारण: यह व्रत विवाह में विलंब, नौकरी में रुकावट, पढ़ाई में एकाग्रता की कमी और आर्थिक समस्याओं को दूर करने में सहायक है।
गुरुवार व्रत की विधि (Brihaspativar Vrat Vidhi)
प्रातःकाल: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पीले रंग के वस्त्र विशेष शुभ माने जाते हैं।
संकल्प: भगवान बृहस्पति व विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
पूजा सामग्री: पीले फूल, चने की दाल, पीली मिठाई (बेसन के लड्डू या हलवा), हल्दी, केसर, पीले फल (केला) और गंगाजल तैयार रखें।
मंत्र जाप: बृहस्पति देव के मंत्र "ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः" या विष्णु मंत्र "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जाप करें।
कथा श्रवण: नीचे दी गई गुरुवार व्रत कथा को पढ़ें या सुनें।
आरती: पूजा के अंत में बृहस्पति देव या भगवान विष्णु की आरती करें।
भोग लगाएं: चने की दाल, पीली मिठाई और पीले फलों का भोग लगाएं।
दान: दोपहर के समय किसी ब्राह्मण, गुरुजन या जरूरतमंद को पीली वस्तुएं (चने की दाल, हल्दी, बेसन, पीले वस्त्र, केला आदि) का दान अवश्य करें।
भोजन: व्रत में कुछ लोग फलाहार करते हैं, तो कुछ एक समय ही भोजन करते हैं। संभव हो तो पीले रंग का ही भोजन (जैसे बेसन की पूड़ी, हलवा) ग्रहण करें।
गुरुवार व्रत कथा (Brihaspativar Vrat Katha)
पुराने समय में एक धनी सेठ था। उसके पास अपार धन-संपत्ति थी, लेकिन उसके कोई संतान नहीं थी। इस बात से वह और उसकी पत्नी हमेशा दुखी रहते थे। एक दिन एक संत महाराज उनके घर पधारे। सेठ और सेठानी ने उनकी खूब सेवा की।
संत ने प्रसन्न होकर उनके दुख का कारण पूछा। सेठानी ने कहा, "महाराज, हमारे कोई संतान नहीं है, इसीलिए यह सारा धन व्यर्थ है।" संत ने कहा, "हे पुत्री, तुम प्रति गुरुवार को व्रत रखा करो। भगवान बृहस्पति की पूजा और इस व्रत की कथा सुनकर, पीली वस्तुओं का दान किया करो। ऐसा करने से तुम्हारी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी।"
संत की आज्ञा मानकर सेठानी ने नियमपूर्वक गुरुवार का व्रत रखना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद, सेठानी ने एक सुंदर और स्वस्थ पुत्र को जन्म दिया। समय बीतता गया और वह बालक बड़ा होने लगा।
एक बार जब वह युवा हुआ तो उसके विवाह की बात चली। सेठ ने व्यापार के सिलसिले में दूसरे नगर में जाना था, इसलिए उसने अपने बेटे को ही विवाह के लिए दुल्हन देखने भेजा। रास्ते में एक नदी पड़ी। नदी पार करते समय उस युवक की मुलाकात एक सुंदर कन्या से हुई। दोनों एक-दूसरे पर मोहित हो गए।
युवक ने घर लौटकर अपने माता-पिता को उस कन्या के बारे में बताया। सेठ और सेठानी राजी हो गए और दोनों का विवाह तय हो गया। लेकिन विवाह के कुछ दिन पहले ही, उस युवक की मृत्यु हो गई।
सेठ और सेठानी के सारे सुहाग मिट्टी में मिल गए। उनका जीवन अंधकारमय हो गया। लेकिन सेठानी ने हिम्मत नहीं हारी और अपने नियम के अनुसार वह अगले गुरुवार को भी व्रत रखकर पूजा और कथा करने बैठ गई।
उसी दिन, भगवान बृहस्पति देवताओं के साथ उधर से गुजर रहे थे। उन्होंने सेठानी की श्रद्धा और निष्ठा देखी। वे सेठानी के पास आए और पूछा, "हे माता, तुम इतनी दुखी क्यों हो?" सेठानी ने अपने पुत्र की मृत्यु का सारा वृत्तांत सुनाया।
बृहस्पति देव ने कहा, "चिंता मत करो। तुम्हारी श्रद्धा और इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारा पुत्र जीवित हो जाएगा।" इतना कहकर बृहस्पति देव ने अपने अमृत कलश से उस युवक के शरीर पर अमृत की कुछ बूंदें छिड़कीं। कुछ ही क्षणों में युवक जीवित हो उठा।
इस चमत्कार को देखकर सेठ और सेठानी की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने बृहस्पति देव का कोटि-कोटि धन्यवाद किया। कुछ दिनों बाद उस युवक का विधिवत विवाह हुआ और वे सभी सुखपूर्वक रहने लगे।
कथा का सार:
इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची श्रद्धा और नियम से किया गया गुरुवार का व्रत महान संकटों को भी दूर करके मनवांछित फल प्रदान करता है।
॥ ॐ बृहस्पतये नमः ॥
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