गोवर्धन पूजा विधि

भगवान कृष्ण की गोवर्धन लीला और अन्नकूट पर्व

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गोवर्धन पूजा का परिचय

गोवर्धन पूजा दीपावली के अगले दिन कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाई जाती है। इस दिन भगवान कृष्ण ने इंद्र के अहंकार को चूर कर गोवर्धन पर्वत की पूजा का महत्व समझाया था। यह पर्व प्रकृति पूजन और कृषि संस्कृति से जुड़ा हुआ है।

महत्वपूर्ण जानकारी

गोवर्धन पूजा को अन्नकूट के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन घरों में विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं और गोवर्धन पर्वत का प्रतीकात्मक रूप से पूजन किया जाता है।

पूजन सामग्री

मुख्य सामग्री

गोवर्धन पर्वत का प्रतीक (गोबर से बना), गाय का गोबर, फूल, मिट्टी, गंगाजल, चावल, रोली

धूप-दीप सामग्री

धूप, दीपक, घी, कपूर, अगरबत्ती, कुमकुम, हल्दी, चंदन

प्रसाद सामग्री

अन्नकूट (विभिन्न सब्जियों का मिश्रण), चावल, दाल, पूरी, हलवा, खीर, फल, मिठाई

विशेष सामग्री

गाय का दूध, दही, घी, गुड़, तुलसी के पत्ते, पान के पत्ते, सुपारी, इलायची

पूजा विधि

प्रथम चरण

सबसे पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। गोबर से गोवर्धन पर्वत का प्रतीक बनाएं और उसे सजाएं।

द्वितीय चरण

गोवर्धन पर्वत के प्रतीक पर फूल, चावल, रोली चढ़ाएं और दीपक जलाएं। गाय के गोबर से अन्य प्रतीक भी बनाएं।

तृतीय चरण

गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करें और इस मंत्र का जाप करें: "गोवर्धन धराधार गोवर्धन धराधार"

चतुर्थ चरण

अन्नकूट का भोग लगाएं और आरती करें। प्रसाद वितरित करें और गायों को चारा खिलाएं।

गोवर्धन पूजा की पौराणिक कथा

गोवर्धन पूजा की कथा भगवान कृष्ण के बाल लीलाओं से जुड़ी हुई है। वृंदावन के लोग इंद्र देवता की पूजा करते थे और उन्हें वर्षा का देवता मानकर भोग लगाते थे।

एक बार बाल कृष्ण ने देखा कि सभी लोग इंद्र की पूजा के लिए तैयारियाँ कर रहे हैं। उन्होंने नंद बाबा से पूछा, "पिताजी, आप सब इंद्र की पूजा क्यों कर रहे हैं?"

नंद बाबा ने उत्तर दिया, "पुत्र, इंद्र वर्षा के देवता हैं। उनकी कृपा से ही हमें वर्षा मिलती है और हमारी फसलें उगती हैं।"

तब कृष्ण ने कहा, "हमें तो गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए, जो हमारी गायों को चारा देता है और हमारी रक्षा करता है। इंद्र तो बहुत दूर हैं, लेकिन गोवर्धन पर्वत तो हमारे सामने ही है।"

कृष्ण की बात मानकर सभी गोप-गोपियों ने इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा की। इससे इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने वृंदावन में मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी।

तब भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा लिया और सभी गोप-गोपियों एवं पशुओं को सात दिनों तक वर्षा से बचाया। अंत में इंद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने कृष्ण से क्षमा मांगी।

तब से हर साल गोवर्धन पूजा का पर्व मनाया जाता है, जो प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है।

गोवर्धन पूजा का महत्व

प्रकृति पूजन

गोवर्धन पूजा प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है। यह हमें पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के महत्व का संदेश देता है।

कृषि संस्कृति

यह पर्व कृषि संस्कृति से जुड़ा हुआ है और किसानों के परिश्रम को सम्मान देता है। अन्नकूट के माध्यम से विभिन्न फसलों का सम्मान किया जाता है।

अहंकार का त्याग

गोवर्धन पूजा की कथा हमें अहंकार त्यागने और विनम्रता अपनाने की शिक्षा देती है, जैसे इंद्र ने अपना अहंकार त्याग दिया था।